देख बात इतनी है की मैं हूं एक बड़े बाप की औलाद

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Screen-Shot-2016-01-12-at-10.03.23-AMअक्सर हम जिस समाज में रहते है वहा इस तरह की बाते सुनते रहते है कि अगर उनके घर का कोई भी एक अच्छी पोस्ट में तेनात है तो छोटे मोटे झगड़े में भी हम सामने वाले व्यक्ति को उसका नाम लेकर ही डराते है | सुनने में ये एक आम बात है, जो हमारे समाज में दूसरो को नीचा दिखाने के लिए किया जाता है |

ऐसी ज्यदातर बाते हम अपनी युवा पीड़ी के लड़को में देखते है, कि आम तौर पर छोटी बात हो या बड़ी, सब लड़ाई में यही धमकी दी जाती है मेरा बाप ये है या वो है | आप जानते ही है कि हमारे समाज में युवाओ में इतना जोश होता है की वो समाने वाले से थोड़ा भी नीचे होना गवार नही कर सकते | जी हां, देखा जाता है कि आम बहस में भी लोग गुंडे बुलाकर मरने मारने की बात करने लगते है | ये लड़को में तो आम बात है, लेकिन जब यही हम लड़कियों में देखते है तो बात मुद्दे की बन जाती है |

जी हां, हमारा समाज ऐसा बन गया है कि अब लड़किया भी कहती है कि मैं बताती हू कोन हू मैं, हां हू मैं बड़े बाप की बेटी | हम चाहे कितना भी पढ़ लिखकर बड़े अफसर ही क्यों न बन जाये, लेकिन दूसरो के सामने हम कभी झूक नही सकते | दरसल मसला दिल्ली मेट्रो का है जहा केवल एक सीट के लिए बात इतनी बड़ गई कि लडकियों ने बात को मार पिटाई तक लाकर खड़ा कर दिया | बात शुरू हुई थी मेट्रो में होने वाली भीड़ से, ये आम बात है सुबह का ऑफिस समय हो या शाम का ऑफिस से घर जाने का मेट्रो में भीड़ होनी ही है | अब इस भीड़ में धक्का तो आपको लगेगा ही क्योंकि सबको जल्दी है पहले जाने की | अब बड़े बाप की बेटी है तो केसे कोई धक्का बरदास कर सकती है तो बस मुद्दा मिल गया लड़ाई का, एक अधउम्र की औरत को धमकी मिली की तू बाहर निकल तुझे मैं बताती हू मैं क्या हू… मैं हू बड़े बाप की बेटी | हमारे समाज में लोगो में सहनशीलता बिलकुल भी नही बची है, होती तो इस मुद्दे में बात यहा तक पहुचती ही नही | तो प्रश्न ये उठता है कि क्या हर बात का हल लड़ाई है या संतोष ? फैसला अब आपको करना है….

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